Sunday, July 23, 2017

बतकही

सुनो,
मुझे चूमते हुए तुम
हाँ तुम ही

मान सको तो मानना प्रेम वह सबसे बड़ा प्रायश्चित है
जो मैं तुम्हारे प्रति किये गए अपराधों का कर सकती हूँ

मेरा तुमसे प्रेम
मेरी देह के अब मेरे पास
"न होने" का प्रायश्चित है

**

सुनो,
नखरीली शिकायतों वाले तुम

बहुत बदमाश पीपल का घना पेड़ हो तुम
छाँव में बैठी जोगनियों को छेड़ने के लिए
पहले उनपर अपने पत्ते गिराते हो

फिर अकबका कर जागते हो
जोगनियों के सर
पतझड़ लाने का ठीकरा फोड़ते हो

**

सुनो,
देर रातों को बिना वजह झगड़ने वाले तुम

तुमने क्यों कहा
तुम एक रोतलू बीमार तनावग्रस्त बुढ़िया की आत्मा हो
जिसके पास बैठो तो वह जिंदगी भर मिले दुःखों का गाना गाने लगती है

जैसे हम देना पसंद करते थे
पूरे वाक्य के बजाय चंद शब्दों में
मैंने दिया जवाब "तुम भी "

फिर हम लंबे समय तक साथ बैठकर रोये
फिर हँसे, अपने लिए किसी नए को ढूंढ लेने का ताना दिया
और एक - दूसरे को रोतलू कहा

**

सुनो,
दुनिया की सबसे मासूम नींद सोने वाले तुम

मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया
कि जब मुझे लगता है मैं हार जाऊँगी 
खुद से
ज़माने से
ज़िन्दगी की दुरभिसंधियों से
मैं अपनी स्टडी टेबल से उठकर
तुम्हारा नींद में डूबा चेहरा देखती हूँ

तुम्हारी पतली त्वचा के अंदर बह रहे खून का रंग
कंठ के पास  उँचक - बैठ रही तुम्हारी श्वासों की आवृत्ति
मुझसे मुस्कुरा कर कहती है तुम ऐसे नहीं हार सकती
कि हमने वादा किया था
हम साथ रहेंगे सुख में नहीं तो न सही
लेकिन अपने और सबके लिए की गई सुख की आशा में

**
सुनो,
महँगी दाल और सब्जी के दौर में
भात और आलू खाकर मोटे होते तुम

जिस क्षण प्रेम में चमत्कार न उत्पन्न हो सके
तुम अंतरालों पर भरोसा रखना
तुम्हें प्रतीक्षाएँ मेरे पास लेकर आएँगी
होगी कोई बेवजह सी लगने वाली बेवकूफी भरी बात
जो स्मृति बनकर तुम्हारे मन को अकेलेपन में गुदगुदाएगी

कर सको तो बस इतना सा उपकार करना प्रेम पर
अपने अहम् के महल में प्रेम को कभी ईंटों की जगह मत आँकना
मेरे नेह पगे शब्दों को कुर्ते पर तमगे की तरह मत टाँकना

**

सुनो,
रसीली बातों और गाढ़ी मीठी
मुस्कान वाले तुम

तुम एक बड़ा सा पका रसभरा चीकू हो
इसे ऐसे भी कह सकते हैं

तुम्हारे अंदर बहुत सारे पके रसभरे चीकू भरे हैं
जो मेरी ओर देख - देख कर मुस्कराते हैं

सुनो ज़रा कम - कम मुस्कुराया करो
ज़ोर से चोंच मारने वाली चिड़ियों को
थोड़ा कम -ज़ियादा लुभाया करो  

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सुनो,
गर्वीले और तुनकमिजाज़ मन वाले तुम


हमेशा कुछ बातें याद रखना
जिन्होंने तुम्हारी देह पर चुभोये होंगे
लपलपाते चाकू और बरछियाँ
वे तुम्हारी सुघडता की नेकनामी लेने आएंगे

जिन्होंने तुम पर तेज़ाब उड़ेला होगा
वे तुम्हारी जिजीविषा के
परीक्षक होने का ख़िताब पाएंगे

जिन्होंने शाख से काट कर
तुम्हें कीचड़ में फेंक दिया होगा
तुम्हारे वहां जड़ जमा लेने पर
वे तुम्हारे पोषक माली कहलायेंगे

उनसे बचना जो बहुत तारीफ़ या अतिशय निंदा करें
पुरानी पहचान की किरचें निकाल कर
वर्तमान में इंसान को शर्मिंदा करना
कुंठित लोगों का प्रिय शगल है

**

सुनो
आधी उम्र बीत जाने के बाद
ज़रा शातिर ज़रा लापरवाह हुए तुम
हाँ तुम ही

जाने कैसे पढ़ लेते हो तुम मेरा मन
कि अब नाराज़ होकर उठकर जाना चाहती हूँ मैं
और उठने से ठीक पहले तुम मेरा हाथ पकड़ लेते हो 

प्रेम में लंबे समय तक होना शातिर बना देता है 
जबकि प्रेम के स्थायित्व पर विश्वास होना
प्रेमी को लापरवाह बनाता है

**

सुनो
लंबी अंतरालों तक गुम हो जाने वाले तुम

यह न सोचा करो कि मेरा प्रेम
तुम्हारे सर्वश्रष्ठ होने का प्रतिफल है
यह तुम्हें प्रेम करते हुए
तुम में सर्वश्रेष्ठ पाने का संबल है

**
सुनो
कड़वी और जली - भुनी बातों वाले तुम
हाँ कि बस तुम ही

कोई गुण तो हरी घाँस की नोक का भी होगा
वरना चुभते नुकीलेपन के माथे
ऐसे कैसे जमी रह जाती मुझ सी तरल
ओस की नाज़ुक़ बूँद.
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Friday, July 7, 2017

डर




मुझे ऊंचाई से कभी डर नही लगा 
तब के अलावा, जब मैंने रोप-वे में
डिब्बेनुमा कोठरी की काँच से
खाई के तल की गहराई देखी

पहले तो मैं सालों तक
उसकी पुरानी चिट्ठियाँ खोल कर पढने से डरती रही
लेकिन फिर एक दिन मैंने
खतों में लिखे शब्द खुरचकर निकाले
उन्हें भिगोकर एक गमले में बो दिया

उनमें अंकुर फूटे
वैजयंती मोती जैसे चमकीले बूटे फले
मैं यह रहस्य समझी
कि शिव के आँसू पेड़ पर कैसे लगते हैं

पनीली चमक लिए
इन मोतियों को कविता में पिरोते
दुःख की अतल खाई को
मैंने आकाश में बदलते देखा

वे चिट्ठियाँ सफ़ेद पंखों की शक़्ल में
मेरे कंधों पर उग आयीं.

फिर कभी मुझे रोप वे की कोठरी से नीचे
खाई का तल देखने पर भय नही महसूस हुआ।

Friday, June 16, 2017

पक्षी, दीमकों और पंखों की कथा.

एक पक्षी था. अपने कुटुंब के साथ आसमानों तक उड़ान भरता हुआ. उसकी नज़र तेज़ थी. वह दूर तक देख लेता था. उसके कान तेज़ थे वह दूर की आवाजें सुन लेता था. एक दिन आसमान में उड़ते हुए उसे एक बैलगाड़ी दिखी. गाड़ीवान ऊँची आवाज में चिल्लाता जा रहा था "दो दीमकें लो, एक पंख दो ". पक्षी को दीमकें बहुत पसंद थी. वे आसानी से नहीं मिलती थी, उनके लिए ज़मीन तक आना पड़ता था. यह बड़ी सुविधा थी कि स्वादिष्ट दीमकें कोई महज़ एक पंख के बदले दे रहा था. पक्षी नीचे आता है. पेड़ की डाल पर बैठता है. गाड़ीवान और पक्षी के बीच सौदा पक्का होता है. हालाँकि अपनी चोंच से एक पर खींच कर तोड़ने में पक्षी को दर्द तो होता है, लेकिन दीमकों का स्वाद उसे यह दर्द भुला देता है.

पक्षी का पिता उसे यह समझाने की कोशिश करता है कि दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं है, और इसके बदले पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते. पक्षी नहीं मनता है. वह हर तीसरे प्रहर आकाश से नीचे धरती में पेड़ की डाल तक आता एक पंख देता, और दो दीमकें ले जाता. दीमकों की लत लग गयी थी उसे.

एक दिन उसने उड़ने की क्षमता खो दी. अब वह सिर्फ दो पेड़ों तक फुदक ही पाता था. लेकिन दीमक बेचने वाले का भरसक इंतजार करता. कभी - कभी गाड़ीवाले को देर हो जाती, कभी वह नहीं भी आता था. पक्षी ने सोचा अब से मैं खुद धरती पर जाकर दीमकें जमा करूंगा . बात की बात में उसने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं. वह खुश हुआ .जब गाड़ीवाला आया पक्षी ने कहा "देख लो, मैंने ढेर सारी दीमकें जमा कर लीं ". गाड़ीवाले को कुछ समझ नहीं आया, "तो ?" उसने पूछा . "मुझसे दीमक लेकर मेरे पंख दे दो" पक्षी ने कहा . अब गाड़ीवाला हंसा, "मैं पंखों के बदले दीमकें देता हूँ. दीमकों के बदले पंख नहीं" गाड़ीवाले ने जवाब दिया और गाड़ी मोड़कर चलता बना.

पक्षी हतप्रभ डाल पर बैठा रह गया. एक दिन बिल्ली आयी और उसे खा गयी.
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कथा "मुक्तिबोध" की है. मैंने संक्षेप में लिखा है. कथा के और कई अर्थ हो सकते हैं लेकिन मुझे न जाने क्यों इस कथा में हर बार एक स्त्री का अस्तित्व दीखता है.


प्रेम हो या जीवन पंख न खोने दीजिए, पंख आसानी से नहीं उगते.

Sunday, June 4, 2017

अधूरी नींद का गीत



अधूरी नींद का गीत 


तुम मिलते हो पूछते हो कैसी हो ?
मैं कहती हूँ  “अच्छी हूँ”..

(जबकि जवाब सिर्फ इतना है
जिन रास्तों को नही मिलता उनपर चलने वालों का साथ
उन्हें सूखे पत्ते भी जुर्अत करके दफना देते है
एक दिन इश्क़ में मांगी गयी तमाम रियायतें
दूर से किसी को मुस्कराते देख सकने तक सीमित हो जाती है
मुश्क़िल यह है, यह इतनी सी बात भी
दुनिया भर के देवताओं मंज़ूर नही होती
इसलिए मैं दुनिया के सब देवताओं से नफरत करती हूँ
 
(देवता सिर्फ स्वर्गी जीव नही होते)

मैं तुम्हारे लौटने की जगह हूँ

(कोई यह न सोचे की जगहें हमेशा
स्थिर और निष्क्रिय ही होती हैं )

प्रेम को जितना समझ सकी मैं ये जाना
प्रेम में कोई भी क्षण विदा का क्षण हो सकता है
किसी भी पल डुबो सकती है धार
अपने ऊपर अठखेलियां करती नाव को

(यह कहकर मैं नाविकों का मनोबल नही तोड़ना चाहती
लेकिन अधिकतर नावों को समुद्र लील जाते हैं )  

जिन्हें समुद्र न डुबोये उन नावों के तख़्ते अंत में बस
चूल्हे की आग बारने के काम आते हैं
पानी की सहेली क्यों चाहेगी ऐसा जीवन
जिसके अंत में आग मिले ?

(समुद्र का तल क्या नावों का निर्वाण नहीं है
जैसे
डूबना या टूटना सिर्फ नकारात्मक शब्द नहीं हैं)

तुम्हारे बिना नही जिया जाता मुझसे
यह वाक्य सिर्फ इसलिए तुमसे कभी कह न सकी मैं
क्योंकि तुम्हारे बिना मैं मर जाती ऐसा नही था

(मुझे हमेशा से लगता है विपिरीतार्थक शब्दों का चलन
शब्दों की स्वतंत्र परिभाषा के खिलाफ एक क़िस्म की साजिश है )

हम इतने भावुक थे की पढ़ सकते थे
एक दूसरे के चेहरे पर किसी बीते प्रेम का दुःख
मौजूदा आकर्षण की लिखावट

 (सवाल सिर्फ इतना था कि
कहाँ से लाती मैं अवसान के दिनों में उठान की लय
कहाँ से लाते तुम चीमड़ हो चुके मन में लोच की वय)

ताज़्ज़ुब है कि न मैं हारती हूँ, न प्रेम हारता है
मुझे विश्वाश है तुम अपने लिए ढूंढ कर लाओगे
फिर से एक दिन छलकती ख़ुशी
मैं तुम्हे खुश देखकर खुश होऊँगी
एक दिन जब तुम उदास होगे
तुम्हारे साथ मुट्ठी भर आँसू रोऊँगी

(हाँ, इन आँसूओं में मेरी भी नाक़ामियों की गंध मिली होगी

लेकिन फ़िलहाल
इन सब बातों से अलग
अभी तुम सो रहे हो

तुम सो रहे हो
जैसे प्रशांत महासागर में
हवाई के द्वीप सोते हैं 
तुम सो रहे हो
लहरों की अनगिनत दानवी दहाड़ों में घिरे शांत
पानी से ढंकी - उघरी देह लिए लेकिन शांत
तुम सो रहे हो
धरती का सब पानी रह - रह उमड़ता है
तुम्हारी देह के कोर छूता है खुद को धोता है
तुमसे कम्पनों का उपहार पाकर लौट जाता है 
तुम सो रहे हो
स्याह बादल तुमपर झुकते, उमड़ते हैं
बरसते हुए ही हारकर दूर चले जाते हैं   
तुम सो रहे हो
सुखद आश्चर्य की तरह शांत
मैं अनावरण की बाट जोहते
रहस्य की तरह अशांत जाग रही हूँ.